स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी
स्वप्नद्रष्टा
आपकी शिक्षा, अनुशासन और आध्यात्मिक दृष्टि हमें निरंतर आगे बढ़ने की शक्ति देती है.
यह लेख परमपूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी के जीवन, व्यक्तित्व और कार्यों पर आधारित है।
स्वामी जी का जन्म 3 मई 1949 को हुआ और 12 दिसंबर 1969 को उन्होंने संन्यास ग्रहण किया। 1970 में वे श्रवणबेलगोला मठ के मठाधिपति बने। उनके नेतृत्व में श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला का व्यापक विकास हुआ—मंदिरों का जीर्णोद्धार, नित्यपूजा व्यवस्था, यात्रियों और साधु-संतों के लिए सुविधाएं, अस्पताल, शिक्षण संस्थान और शोध केंद्र स्थापित किए गए।
उन्होंने 1981, 1993, 2006 और 2018 के महामस्तकाभिषेक जैसे विशाल आयोजनों का सफल संचालन किया। 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें “कर्मयोगी” की उपाधि दी।
स्वामी जी ने जैन साहित्य के संरक्षण, प्राकृत भाषा के प्रचार, अनेक ग्रंथों के संपादन-प्रकाशन तथा सामाजिक सेवा कार्यों—जैसे निःशुल्क चिकित्सालय, मोबाइल चिकित्सा, विकलांग सहायता—में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे कई भाषाओं के ज्ञाता और सरल, अनुशासित व त्यागमय जीवन जीने वाले संत थे।
2017 में उन्हें कर्नाटक सरकार द्वारा महावीर शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
23 मार्च 2023 को श्रवणबेलगोला में उनका समाधिमरण हुआ।
