अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज
मार्गदर्शक
आपकी शिक्षा हमें करुणा और समर्पण के साथ आगे बढ़ने की शक्ति देती है
त्याग, मौन साधना और समाज-निर्माण का जीवंत प्रतीक
3 जुलाई 1980 को पिपलगोन (म.प्र.) में जन्मे चक्रेश जैन ने किशोरावस्था में ही वैराग्य मार्ग अपनाया। वर्ष 2015 में आचार्य अभिनन्दन सागर जी के सान्निध्य में मुनि दीक्षा लेकर उन्होंने स्वयं को धर्म, साधना और समाज सेवा को समर्पित कर दिया।
48 दिनों की गहन मौन साधना और वर्षों की तपस्या उनके आध्यात्मिक जीवन की विशेष पहचान है। उन्होंने अक्षर कलश अभियान, संस्कार दीक्षा और संस्कार यात्रा जैसे प्रयासों के माध्यम से जैन संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ने का कार्य किया।
उनका जीवन संदेश स्पष्ट है —
“इच्छाओं का अंत ही मोक्ष का आरंभ है।”
अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज केवल एक संत नहीं, बल्कि धर्म, संस्कार और जागरण का एक प्रेरक आंदोलन हैं।
