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सांस्कृतिक संरक्षण

जैन धर्म के अस्तित्व को सुरक्षित रखना,जैन इतिहास एवं जिनवाणी का व्यापक प्रचार-प्रसार करना,स्वाध्याय परंपरा को पुनः जीवित करना

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शैक्षिक पहल

शिक्षा और प्रशिक्षण के माध्यम से नई पीढ़ी को जैन मूल्यों से जोड़ना।

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समग्र विकास

परिवार और समाज में सद्भाव, शांति और अनुशासन की प्रेरणा देना,आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न रोगों एवं संकटों से बचने हेतु आहार-विहार और संयमपूर्ण जीवन पर मार्गदर्शन प्रदान करना

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मार्गदर्शन और प्रेरणा

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के मंगल आशीर्वाद से आरोहण एक ऐसा पावन परिवार के रूप में स्थापित होगा, जहाँ धर्म के स्पष्ट मार्गदर्शन में धार्मिक, सामाजिक , व्यापार से जुड़ने और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ सात्विक मनोरंजन

ज्ञान और संस्कार की नई उड़ान

About Arohan

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज के मंगल आशीर्वाद से आरोहण एक ऐसा पावन परिवार के रूप में स्थापित होगा, जहाँ धर्म के स्पष्ट मार्गदर्शन में धार्मिक, सामाजिक , व्यापार से जुड़ने और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के साथ-साथ सात्विक मनोरंजन के आयोजन भी होंगे। इसमें बालकों से लेकर युवाओं, वृद्धजनों और अनुभवी व्यक्तियों—सभी वर्गों का समन्वित संगठन होगा, जिससे एकता और सामूहिक शक्ति का भाव सुदृढ़ होगा।
यहाँ संस्कार और संस्कृति की रक्षा के साथ ऐसा वातावरण निर्मित किया जाएगा, जिसमें परिवार और समाज एक सूत्र में पिरोए दिखाई दें। आरोहण का संकल्प है—समाज को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना,जैन धर्म के अस्तित्व को सुरक्षित रखना,जैन इतिहास एवं जिनवाणी का व्यापक प्रचार-प्रसार करना,स्वाध्याय परंपरा को पुनः जीवित करना,परिवार और समाज में सद्भाव, शांति और अनुशासन की प्रेरणा देना,आधुनिक जीवनशैली से उत्पन्न रोगों एवं संकटों से बचने हेतु आहार-विहार और संयमपूर्ण जीवन पर मार्गदर्शन प्रदान करना | भविष्य में यह संगठन एक श्रृंखला (चेन) के रूप में कार्य करेगा, जिसमें कम से कम 15 सदस्य मिलकर एक परिवार का गठन करेंगे। प्रत्येक परिवार का नाम किसी धार्मिक शब्द, जैन महापुरुष, जैन तीर्थक्षेत्र या जैन पुराण से प्रेरित होगा—किसी व्यक्ति विशेष से नहीं। उदाहरण: आरोहण – अरिहंत परिवार। प्रत्येक परिवार, आरोहण के निर्धारित नियमों और सुझावों को पूरी श्रद्धा से स्वीकार करेगा। आरोहण का मूल उद्देश्य:संतवाद और पंथवाद से ऊपर उठकर केवल तीर्थंकरों की वाणी को मानना और उसी के अनुसार जीवन का संचालन करना।सदस्यता नियम:सदस्य वही होगा जो अहिंसा धर्म को मानने वाला हो , जैन संतों में आस्था रखता हो और उनके वचनों का पालन करता हो।वर्ष में तीन निर्धारित बैठकें होंगी:

    • 1. धार्मिक दृष्टि से
    • 2.मर्यादित मनोरंजन के साथ
    • 3.सामाजिक,व्यापार एवं अन्य कार्यों के लिए |

आरोहण विस्तार: संपूर्ण भारत और भविष्य में भारत से बहार भी किया जाएगा ।

हमारे मार्गदर्शक

संस्कार और संस्कृति के पथप्रदर्शक ‘आरोहण’ संगठन का मार्गदर्शन अंतर्मुखी मुनि पूज्यसागर महाराज जी के पावन सान्निध्य में हो रहा है। उनका जीवन और उपदेश हमें यह सिखाते हैं कि जैन संस्कृति और जीवनोपयोगी संस्कार केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवनशैली हैं। महाराज जी का उद्देश्य है कि समाज में शांति, अहिंसा और सद्भावना का वातावरण बने। उनके मार्गदर्शन में ‘आरोहण’ संगठन हर स्तर पर संस्कारों की स्थापना और संस्कृति के संवर्धन के लिए कार्यरत है।

मार्गदर्शक
अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज

अंतर्मुखी मुनि श्री पूज्य सागर महाराज

त्याग, मौन साधना और समाज-निर्माण का जीवंत प्रतीक

3 जुलाई 1980 को पिपलगोन (म.प्र.) में जन्मे चक्रेश जैन ने किशोरावस्था में ही वैराग्य मार्ग अपनाया। वर्ष 2015 में आचार्य अभिनन्दन सागर जी के सान्निध्य में मुनि दीक्षा लेकर उन्होंने स्वयं को धर्म, साधना और समाज सेवा को समर्पित कर दिया।

48 दिनों की गहन मौन साधना और वर्षों की तपस्या उनके आध्यात्मिक जीवन की विशेष पहचान है। उन्होंने अक्षर कलश अभियान, संस्कार दीक्षा और संस्कार यात्रा जैसे प्रयासों के माध्यम से जैन संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ने का कार्य किया।

उनका जीवन संदेश स्पष्ट है —
“इच्छाओं का अंत ही मोक्ष का आरंभ है।”

अंतर्मुखी मुनि पूज्य सागर महाराज केवल एक संत नहीं, बल्कि धर्म, संस्कार और जागरण का एक प्रेरक आंदोलन हैं।

स्वप्नद्रष्टा
स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी

स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी

यह लेख परमपूज्य जगद्गुरु कर्मयोगी स्वस्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामी जी के जीवन, व्यक्तित्व और कार्यों पर आधारित है।

स्वामी जी का जन्म 3 मई 1949 को हुआ और 12 दिसंबर 1969 को उन्होंने संन्यास ग्रहण किया। 1970 में वे श्रवणबेलगोला मठ के मठाधिपति बने। उनके नेतृत्व में श्रीक्षेत्र श्रवणबेलगोला का व्यापक विकास हुआ—मंदिरों का जीर्णोद्धार, नित्यपूजा व्यवस्था, यात्रियों और साधु-संतों के लिए सुविधाएं, अस्पताल, शिक्षण संस्थान और शोध केंद्र स्थापित किए गए।

उन्होंने 1981, 1993, 2006 और 2018 के महामस्तकाभिषेक जैसे विशाल आयोजनों का सफल संचालन किया। 1981 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने उन्हें “कर्मयोगी” की उपाधि दी।

स्वामी जी ने जैन साहित्य के संरक्षण, प्राकृत भाषा के प्रचार, अनेक ग्रंथों के संपादन-प्रकाशन तथा सामाजिक सेवा कार्यों—जैसे निःशुल्क चिकित्सालय, मोबाइल चिकित्सा, विकलांग सहायता—में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे कई भाषाओं के ज्ञाता और सरल, अनुशासित व त्यागमय जीवन जीने वाले संत थे।

2017 में उन्हें कर्नाटक सरकार द्वारा महावीर शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
23 मार्च 2023 को श्रवणबेलगोला में उनका समाधिमरण हुआ।

मार्गदर्शक
स्वस्तिश्री आगम कीर्ति भट्टारक स्वामीजी

स्वस्तिश्री आगम कीर्ति भट्टारक स्वामीजी

श्रवणबेलगोला जैन मठ के उत्तराधिकारी पूज्य स्वस्तिश्री आगम कीर्ति भट्टारक स्वामीजी का पूर्वाश्रम नाम श्री आगम इन्द्र है। आपका जन्म दिनांक 26 फरवरी 2001 को कर्नाटक राज्य के शिवमोग्गा जिले के सागर नगर में हुआ। आपके पिता का नाम श्री अशोक कुमार इन्द्र तथा माता का नाम श्रीमती अनीता अशोक कुमार इन्द्र है। आपका निवास स्थान जैन मंदिर, नेहरू मैदान, सागर (जिला शिवमोग्गा) रहा है।

आपकी प्रारंभिक शिक्षा रोटरी हायर प्राइमरी स्कूल, सागर में तथा माध्यमिक शिक्षा एम.जे.एन. पै हाई स्कूल, सागर में संपन्न हुई। पूर्व-स्नातक (PUC) शिक्षा एस.डी.एम. पी.यू. कॉलेज, उजिरे (दक्षिण कन्नड़) से तथा स्नातक शिक्षा एल.बी. एवं एस.बी.एस. कॉलेज, सागर से प्राप्त की।

आप एन.सी.सी. के ‘बी’ एवं ‘सी’ प्रमाणपत्र धारक रहे हैं। कंप्यूटर शिक्षा में बेसिक एवं ऑफिस ऑटोमेशन (41 कोर्स) के साथ टैली ERP-9 (लेवल 1) का प्रशिक्षण प्राप्त किया है। कन्नड़, हिंदी एवं अंग्रेजी भाषाओं पर आपकी अच्छी पकड़ है।

पूर्वाश्रम काल में आपने अपने पिता एवं पंडित श्री मोहन कुमार प्रतिष्ठाचार्य के सान्निध्य में विविध धार्मिक अनुष्ठानों एवं आराधनाओं में सक्रिय सहभागिता निभाई।

दिनांक 27 मार्च 2023 (सोमवार) को आपका विधिवत् पट्टाभिषेक (दीक्षा) संपन्न हुआ, जिसके साथ आप श्रवणबेलगोला जैन मठ के उत्तराधिकारी के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

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